कहानी (अधूरा कागज) वैभव बेख़बर
चेहरे पर गहरी थकान, आँखों में बुझती उम्मीदें, और होठों पर एक मरा-मरा-सा मुस्कान का घूँघट लिये आरवी जिंदगी के संघर्षों से जद्दोजहद करती हुई जीवन व्यतीत कर रही थी एक औरत, जिसे दुनिया ने बार-बार ठुकराया, और उसने हर बार खुद को समेट कर फिर से जीना सीखा,
आरवी कानपुर से थी, नोयडा में एमिटी यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने आई थी, यहीं उसकी मुलाकात जतिन से हुई, दोनों क्लासमेट थे और अच्छे दोस्त भी थे, आगे चलकर ये दोस्ती प्रेम में तब्दील हो गयी, दोनों क्लास में अच्छे स्टूडेंट्स थे हमेशा एक दूसरे का सहयोग करते थे, सारा कॉलेज इनकी दोस्ती और इंटेलिजेंस की तारीफ़ करता था
जतिन सूरत का रहने वाला था, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के अंतिम वर्ष कैंपस प्लेशमेंट के लिये पाँच रेपोटेड कम्पनियाँ आईं थी, आरवी और जतिन दोनों का अच्छे पैकेज पर सलेक्शन हुआ था, लेकिन दोनों की आपसी सहमति से , उन्होंने ऐसी कम्पनी को चुना जिसने उन्हें एक ही शहर में जॉब करने का मौका दिया, दोनों मुम्बई शिफ्ट हो गये थे,
आरवी और जतिन को अपने प्रेम का अंजाम सोचने का वक़्त आ गया था, क्योंकि आरवी के पापा आरवी की शादी के लिये सोच रहे थे, कहीं न कहीं आरवी और जतिन के रिश्ते की बातें उनके परिवार तक पँहुच गयी थी, दिक्कत यह नहीं थी कि आरवी और जतिन अलग अलग राज्य व शहर से हैं , दिक्कत थी तो यह कि जतिन की जात अलग है, बदलते परिवेश में जतिन को आरवी के पिता स्वीकार भी कर लेते अगर वह सवर्ण होता लेकिन जतिन तो पिछड़ी जाति से आता था और आरवी , आरवी मिश्रा,
फिर क्या कोई और रास्ता ही नहीं था, परिवार को छोड़ने के अलावा,
आरवी कुछ दिनों तक बहुत परेशान रही,सामाजिक कुरीतियों को कोसती हुई वह यह भी सोचती थी, कि यह क्या उचित है कि बच्चे बड़े हो गये पढ़-लिख गये, कमाने लगे तो अपने ही परिवार के खिलाफ जाकर शादी कर लें, पिछले पाँच वर्षों के अनुभव के आधार पर उसने जतिन को चुनना उचित समझा, जतिन में उसने एक अच्छे भाई, दोस्त,प्रेमी,पति,साथी की छवि देखी है, फिर
क्या दोनों ने कोर्ट मैरिज शादी कर ली,
इधर जतिन के पिता अपने कस्बे के नामी आदमी थे, क्षेत्र के नेता विधायक मंत्री जी उनका आदर करते थे, उन्हें इस बात का दुःख नहीं था कि जतिन ने किसी दूसरे जाति की लड़की से शादी कर ली, उनकी तमन्ना थी अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर धूमधाम से शादी करने की थी, कि पूरे क्षेत्र के लोग उसकी शादी को याद रखें, जतिन के परिवार ने भी जतिन को स्वीकार नहीं किया।
कुछ बरसों तक दुनिया खुशनुमा लगी,दूसरे वर्ष ही उनका एक बेटा हुआ,उनकी जिंदगी में थोड़े और चार-चाँद लग गये, पर किस्मत को खुशियाँ लंबे समय तक मंजूर नहीं थीं। तीन साल की उम्र में बेटे की भयानक बीमारी से मौत हो गयी, फिर तो जैसे ज़िन्दगी ने धड़कनों को रोक दिया हो। माँ के आँचल में मातम पसर गया।
धीरे धीरे आरवी इस सदमे से उभर तो आयी थी और फिर से जिंदगी में आरवी को एक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ , कुछ ही दिनों में सब आम हो गया और फिर तभी उस वर्ष कोरोना जैसी महामारी आयी इस महामारी में तमाम लोगों की तरह जतिन भी इसका शिकार हुआ, अस्पतालों में डर का माहौल था, संक्रमित लोगों की भीड़ इतनी ज्यादा थी, हज़ारों लोग अपना दम तोड़ चुके थे, जतिन भी इस महामारी से लड़ते हुये दुनिया छोड़ गया, आरवी के सामने दुःख का पहाड़ आकर खड़ा हो गया था, छोटा बेटा गोद में था और कांधे पर अर्थी। चारों ओर सन्नाटा था, और भीतर एक टूटी स्त्री का रुदन, जतिन का जाना जैसे उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कर गया, दिमाग में निर्णय लेने की कोई ताकत नहीं बची थी, ऐसा लगता था कि जैसे बेचारी पागल हो गयी हो,
इन दिनों में उनके ऑफिस की कॉलीग और फ्लैट की पड़ोसी ने उसका बहुत साथ दिया, मानसिक स्थिति के साथ हालात ऐसे न थे कि आरवी बच्चे के साथ जॉब कर सके, जो धन बैंक में इकट्ठा था
धीरे धीरे खत्म होने की कगार पर आ रहा था, कुछ महीने बीते दुनिया ने सब भुला दिया लेकिन एकलौती आरवी अभी भी उसी सदमें में जी रही थी, कभी कभी तो उसके भीतर आत्महत्या करने का विचार आता था, कि अब जीकर क्या करे,
औरत अकेली हो तो समाज उसे दया नहीं, तमगे देता है,ना ससुराल ने पुकारा, ना मायके ने जगह दी।
बच्चे का मुँह देख देख जी रही आरवी ने फिर से खड़े होने की कोशिश की, खर्चों को देखते हुये फ्लैट का किराया मंहगा पड़ रहा था, उसने फ्लैट छोड़ दिया
मुंबई की एक झोंपड़ीनुमा किराए की जगह में बेटे संग ज़िंदगी की गाड़ी खींचती रही। प्राइवेट जॉब में अब उसे दोबारा जगह बनानी थी, लेकिन आरवी अब वैसे नहीं रही कि जैसे पहले थी,
एक जॉब छोड़ती, दूसरी पकड़ती, फिर छूटती, पाँच बार नौकरी बदल चुकी थी। पहले तो मेड रखनी पड़ी थी बेटे की देखभाल के लिये। पर अब बेटे को छोटे बच्चों के होस्टल में डाल दिया है,
शरीर से थकी थी, आत्मा से अकेली आरवी को किसी सहारे की तलाश थी—कोई जिसे अपना कहा जा सके, जिसके सीने पर सिर रखकर रोया जा सके। तभी ऑफिस में उसकी मुलाकात अर्जुन से हुई,बातें हुईं, मुलाकातें बढ़ीं। उसने अरवी की पीड़ा को समझा, बेटे से मिलने की इच्छा जताई। आरवी को लगा—शायद कोई तो है जो अतीत नहीं, आज से रिश्ता बनाएगा।
धीरे-धीरे नजदीकियाँ शरीर तक पहुँचीं, अरवी ने समर्पण किया, प्रेम के विश्वास में, मगर अर्जुन को सिर्फ जैसे जिस्म ही चाहिए था,आत्मा नहीं, शादी की बात करते ही उखड़ जाता था कई बहाने बनाता, बोलता अभी मैं शादी के लिये तैयार नहीं हूँ, धीरे धीरे उसने आरवी से दूरी बनाना शुरू कर दिया, उम्मीद का एक और दरवाज़ा बन्द, आरवी तो जैसे अपने जीवन के दुःख गिन रही थी, अर्जुन के चलते उसे उस जगह भी जॉब छोड़ना पड़ी,क्योंकि वह इस छलावे को बर्दाश्त करते हुये उस ऑफिस में काम नहीं कर सकती थी,
खैर इस बार उसने पहले से ही इंटरव्यू देकर , अपनी जॉब बदल ली, समय गुजरता गया और
फिर छह महीने बाद ऑफिस में ही विकास नाम के साथी से दोबारा स्नेह बढ़ा। उसने और गहरे संवाद जताये,इस बार कुछ अलग लग रहा था,होस्टल साथ में जाता आरवी के बेटे को गोद में खिलाता था, “पापा” जैसे शब्दों का प्रयोग भी होने लगा था, लेकिन कुछ समय बाद उसकी भी सच्चाई बाहर आ गई— वह भी आरवी की बची-कुची देह की कोमलता को नोच लेना चाहता था, मर्द हमेशा ज़िस्म की भूख को प्यार का नाम देकर मिटाने की कोशिश करता है,
और एक दिन उसने आरवी से कह ही दिया.……कि वह सिंगल मदर से शादी नहीं कर सकता।
एक बार फिर दिल टूटा, पर अब दिल टूटने से ज्यादा आत्मा चटकी।
इस समाज में विधवा स्त्री की इच्छा को 'हवस' कहा जाता है, और पुरुष की हवस को 'मर्दानगी'।
आरवी ने अपने अकेलेपन से रिश्ता बना लिया। अब कोई अर्जुन नहीं, कोई विकास नहीं। अब सिर्फ बेटे को पढ़ाना है, नौकरी करनी है, अब अपने लिये कुछ नहीं करना शायद अब उसकी किस्मत में किसी साथी खुशी नहीं लिखी। अब जो है उसका बेटा, अब ज़िन्दगी का हर छण बेटे के जीवन के लिये समर्पित करना है और सबसे ज़रूरी—खुद को टूटने से बचाना है।
उसे अब समझ आ गया था—औरत अगर विधवा हो और बच्चा हो, तो पुरुषों की नज़रों में वह सिर्फ ‘बोझ’ है या ‘बिस्तर’।
उसकी कोख समाज के लिए अभिशाप बन जाती है।
यहाँ औरत की इच्छाएँ चरित्रहीनता मानी जाती हैं, और पुरुष की वासना—‘स्वाभाविक’।
उसने प्रण लिया है—अब कोई पुरुष उसकी साँसों में नहीं घुलेगा, ईश्वर ने शायद उसकी ज़िन्दगी का कागज अधूरा ही लिखा था, अब सिर्फ उसका बेटा ही उसकी हर खुशी है उसकी परवरिश में कोई कमी न रहने पाये, क्योंकि अब वही उसकी ज़िंदगी का आखिरी और सच्चा चाँद-सितारा है।
आरवी- कभी-कभी आईने में खुद को देखती है तो कहती है—
“हाँ, मैंने प्रेम किया, मैंने शरीर सौंपा, क्योंकि मैं भी इंसान हूँ।
पर मैंने अपने अकेलेपन की चुप्पियों को सहलाने के लिए किसी का शोषण नहीं किया,
जिसने मेरा छल किया,वो कोई अर्जुन या विकास नहीं था, एक व्यवस्थित समाज का चेहरा था, जो अपनी हसरतों को पूरा करने के लिये मेरे ज़िस्म तक चले आये मगर समाज की दहलीज से आगे न बढ़ सके!
इसी समाज की व्यवस्था ने पैदा किये हैं तमाम भेदभाव, जो इंसान को उसके जतिधर्म, लिंग के आधार पर बाटते हैं और स्त्री के लिये तो खास तौर पर हर मोड़ पर पाबन्द लगाये हैं,
अब वो खुद से कहती है कि मैं एक पत्नी के रूप में नहीं, एक माँ के रूप में हिम्मत की मिसाल बनूँगी, मैं हर उस स्त्री की आवाज़ हूँ, जिसे दुनिया ने ‘इस्तेमाल’ किया और फिर ‘अकेला’ छोड़ दिया,
आरवी अब सिर्फ एक औरत नहीं, एक सदी की कहानी है।
जहाँ स्त्री सिर्फ माँ, पत्नी या वेश्या के फ्रेम में फिट की जाती है।
जहाँ प्रेम का अधिकार पुरुष का है, और स्त्री को सिर्फ त्याग की देवी समझा जाता है।
उसे अब सहारे नहीं, अपने पैरों की थाप सुननी है।
बेटे की मुस्कान अब उसका भविष्य है, और बीते रिश्तों की राख से उसने अपने आत्मबल की दीपशिखा जला ली है।
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