कहानी (पुनीत पटेल)
वही ट्रैन वही ऐ. सी. कोच मगर आज की यात्रा में अथाह बेचैनी है मैं नौकरी से रिटायर होकर अपने पैतृक गाँव जा रहा हूँ वैसे तो मैं साल में एक-आध बार गाँव आता रहा हूँ किसी त्योहार या किसी आयोजन में छुट्टियाँ लेकर,मगर आज मैं सैदव के लिये अपने जीवन के बचे कुचे दिन अपने खेत-खलिहानों गाँव में बिताने अपने गाँव लौट रहा हूँ ख़यालों की एक आँधी मन से गुज़र रही है नये-पुराने विचार मन में उमड़ रहे हैं नौकरी में बिताये लगभग 30 वर्ष के सारे ख़याल एक चक्रवात की तरह मन में उमड़ रहे हैं आज मेरा गाँव मुझे इस तरह आकर्षित कर रहा है कि जैसे युवा अवस्था में ग्रेजुएशन के दौरान दिमाक में नौकरी पाने के लिये लालायित रहते थे
रात के लगभग 11 बज चुके थे सामने वाली बर्थ के सभी लोग सो रहे थे, मैं अपने मन के उमड़ते ख्यालों को विराम देना चाहता था मैंने बोतल निकाल कर पानी पिया और सोचा बाथरूम करके अब सो जाऊँगा मैं बाथरूम होकर लौट आया पूरे कोच में ख़ामोशी थी सब लोग ही सो रहे थे आवाज सिर्फ ट्रेन के चलने की रफ़्तार की आ रही थी मैं अपनी बर्थ पर लेट गया और आँख बंद करके सोने की कोशिश करने लगा, मैं रातभर सोने की कोशिश ही करता रहा ज़ज्बातों का सैलाब रातभर थमा ही नहीं, सुबह-सुबह 5 बजे ट्रेन मेरे गंतव्य स्थान पर पँहुच गई, स्टेशन से बाहर आकर मैंने एक चाय के ढेले पर खड़े खड़े ही चाय पी ,फिर टैक्सी लेकर मैं अपने गाँव आ गया,
घर में मेरे बड़े भाई और उनका परिवार रहता था उनके दो पुत्र थे एक पुत्र झाँसी में वन विभाग में नौकरी करता है और एक गाँव में ही रहता है भाभी जी अब इस उम्र में खूब पूजा-पाठ करती हैं और बाहर का चबूतरा और कोठी में सुबह-शाम झाड़ू लगातीं हैं घर के अंदर लगभग सब काम बहु ही करती है, दो नाती हैं जो पास के कस्बे में पढ़ने जाते हैं और मेरा भी एक लड़का है जो आई.आई.टी. कानपुर से पढ़ाई किया था उसकी पत्नी कभी उसकी क्लासमेट थी दोनों में प्रेम हुआ दोनों परिवारों को मिलकर ही वह शादी करनी पड़ी थी लेकिन अब वह दोनों भी खुश हैं इस समय दोनों इंग्लैंड में हैं उनकी एक लड़की भी है, मेरी पत्नी का दो साल पहले इलाज के दौरान देहाँत हो गया, उन्हें स्तन कैंसर था देखने से लगता था कैंसर शुरुआती दौर का है कीमोथेरेपी चल रही थी काफ़ी हद तक आराम भी था तीसरी कीमोथैरेपी में जब उन्हें कीमो लगाया गया उसके अलगे दिन उन्हें दस्त होने लगे, दस्त कुछ ज्यादा ही होने लगे उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया डॉक्टर ने कुछ जाँचें करवाई तो पता चला उनकी दोनों किडनी फेल हो चुकी हैं उन्हें इंजेक्शन दिये गये थे बोतल लगी हुई थी अस्पताल बेड पर ही अचानक उन्होंने दम तोड़ दिया था,
लड़का इंग्लैंड शिफ्ट हो गया था इसलिए रिटायरमेंट के बाद मैंने भी गाँव में रहने का फैसला लिया था
समूचे भारत का जैसे प्रतिनिधि करता हो हमारा गाँव राजपुर, हर जाति,समुदाय के लोग रहते हैं गाँव काफ़ी बड़ा था गाँव में शहरों की तरह रहने वाले जाति-समुदाय का मिश्रण नहीं था हर जाति समुदाय की एक बस्ती थी और आबादी का विस्तार भी लगभग उसी तरह ही था जैसे सम्पूर्ण भारत में,इस समय जातिगत भेदभाव पहले की तुलना में बहुत कम है मगर वर्तमान के अखबारों और समाचारों से जो खबरें भेदभाव से घटित हुई घटनाये सुनने को मितली हैं ऐसा हमारे गाँव में घटित होने की सम्भावनायें तक नहीं थीं कभी कभी तो लगता है ऐसी घटनाओं को सुन-सुन कर हमारे गाँव में लोगों के मन में भेदभाव की भावना ना विकसित होने लगे,
गाँव में कुछ महोने बाद प्रधानी के चुनाव होने वाले थे इसलिए गाँव के हर चौराहे/नुक्कड़ पर प्रधानी की ही चर्चे हो रहे हैं कि कौन प्रधान गाँव के विकास के लिये कैसा रहा है अगले चुनाव में कौन-कौन उम्मीदवार है, किसके चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा है वर्तमान में हमारे गाँव के प्रधान एक पंडित जी थे
हमेशा मेरे गाँव में जाति समीकरण चलता था, धन-सम्पन्न लोग मुर्गा-दारू या रूपये देकर वोट खरीदते भी थे, हमारे गाँव में बहुत सी जातियाँ अल्प संख्यक थी, ब्राह्मण समाज भी उनमें से एक था ,आठ-दस घर होंगे पण्डितों के लेकिन पंडित जी हमारे गाँव के प्रधान बने, क्योंकि इस बार बहुसंख्यक समाज से उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा थी, मेरे गाँव में दलित समाज की संख्या लगभग चालीस प्रतिशत रही होगी लेकिन दलित समाज से कभी कोई प्रधान नहीं बनता था, अगर चुनाव में दलित सीट ना आये,
यह वही आरक्षण का प्रावधान है जिसके अंतर्गत चार-पाँच पंचवर्षीय अंतराल में एक बार दलित प्रधान सीट आवंटित होती है तो दलित वर्ग के लोग भी प्रधान बन जाते हैं, अधिकतर वैसे गाँव की प्रधान की सीट पर बहुसंख्यकों का कब्जा रहा है!
आइये आपको कुछ अफवाहों से रूबरू कराता हूँ हमारी बस्ती में एक वर्मा जी रहते थे पहले वे प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक थे मुझसे कुछ पाँच-छः वर्ष ही बड़े होंगे वह भी रिटायर हैं उनके इकलौते लड़के ने किसी दलित लड़की से शादी की थी शादी के पाँच वर्ष बीत चुके थे वर्मा जी का एक नाती भी था, खुशहाल परिवार था पैसे की कोई कमी नहीं थी एक ओबीसी लड़के की शादी दलित लड़की से, यह बात गाँव वालों को हज़म नहीं हो रही थी औरतें आपस मे आज भी उसकी शादी का ज़िक्र कानाफूसी करती रहती हैं दलित वर्ग में आने वाली लगभग सभी जातियों से वर्मा जी की बहू को जोड़ चुके होंगे, मगर वर्मा जी शभ्य समझदार शिक्षित हैं इसलिए उन पर इस बात का प्रभाव समय बीतने के साथ नगण्य हो गया, यहाँ मैं यह बताना चाहता हूँ कि यही कार्य मेरे भी पुत्र ने किया है लेकिन गाँव में किसी ने ऐसा अंतरजातीय विवाह मेरे घर के लिये विचार भी न किया था एक तो मेरे पुत्र की शादी का कार्यक्रम शहर में हुआ था
मेरा पुत्र और बहू दोनों आई. आई .टी हैं वर्ण भेद अब वर्ग भेद में बदल रहा है कि कौन किस लेवल (वर्ग) का अमीर है अब एक आई .ए. एस.....पी.सी.एस. से शादी कर सकता है और MBBS डॉक्टर -डॉक्टर से तो
अब यह समाज जात ना देखकर स्टेटस देखने लगा है .....
अगले दिन मैं अपने भाई के साथ पैदल अपने खेतों को देखने गया गाँव के बाहर स्थित प्राथमिक विद्यालय है वहीं एक चौराहा है उसी चौराहे पर एक पुलिया बनी है जिसके दोनों छोर सीमेंट के चबूतरे बने हुये हैं वहाँ आठ-दस लोगों का जमघट लगा ही रहता है लोग राजनीति पर चर्चा करते हैं फसलों की बुआई जुताई, कटाई इत्यादि चर्चे करते ही रहते हैं, उनमें से कुछ लोगों ने मुझसे भी पूछा कब आना हुआ ,बच्चे कहाँ हैं, और तबियत बगैरह कैसा है इत्यादि सवाल...लगभग सभी के प्रश्नों का उत्तर मैंने एक जैसा ही दिया, मेरे भाई भी अपने दोस्तों के साथ रुककर बातें करने लगे ..मैं थोड़ी देर खड़ा रहा इतने में मेरा ध्यान प्राथमिक स्कूल की तरफ गया तो देखा मेरा एक दोस्त जो कि दूसरे गाँव से था, मुझे ज्ञात था कि वह प्राथमिक स्कूल का शिक्षक है लेकिन यह नहीं पता था कि इस समय वह मेरे गाँव मे ट्रांसफर होकर आया है मैं उसके पास गया नमस्कार हाल चाल हुआ तो उसने बताया इन दिनों वह स्कूल का हेडमास्टर है उसकी भी रिटायरमेंट का आखिरी साल ही चल रहा है..... स्कूल में लगभग सत्तर बच्चे होंगे,स्कूल में कोई भी बच्चा मेरे मुहल्ले या अगड़ी जात का नहीं था सारे बच्चे दलित बस्ती या मुसलमानों की बस्ती के थे ,इससे मुझे अहसास हुआ कि धन संपन्न लोग अपने बच्चों को प्राथमिक स्कूल नहीं भेजना चाहते , सिर्फ गरीब मज़दूर वर्ग के बच्चे ही स्कूल में पढ़ने आते हैं, धरणा बनी हुई है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई ही नहीं होती ,शिक्षक सरकारी तनख्वाह उठाते हैं और स्कूल में सारा दिन मोबाइल चलाते हैं .....अगर सम्पन्न वर्ग के कुछ लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजते तो स्कूल का निरीक्षण करते तो शायद स्कूल में इस तरह का माहौल ही नहीं बना होता ...........शिक्षक मित्र से मैं वार्ता कर ही रहा था कि इतने में मेरे भाई ने मुझे आवाज दी,कि आओ चले .......
फिर मैं उनके साथ कच्चे रस्ते से होते हुये खेत की ओर चल दिया .... इतने में मेरा ध्यान खलिहान की तरफ गया, वहीं खलिहान जो कभी हमारा खेल का मैदान था यहीं मैं अपने बचपन में क्रिकेट खेला करता था, इसी खलिहान में कभी छोटे छोटे टूर्नामेंट आयोजित किये जाते थे, आस-पास के गाँवों की टीमें यहाँ खेलने आया करती थीं, क्रिकेट में मैं एक औसत प्लेयर था जबकि मेरे भाई एक बेहतरीन गेंदबाज थे आज मुझे उन दिनों के वो सारे लड़के याद आ रहे हैं जो कभी हमारे साथ क्रिकेट खेला करते थे, उस समय हमारी बस्ती में जतिवाद की भावना थी लेकिन यह वही खेल का मैदान है जहाँ कोई भेदभाव नहीं था सब साथ में खेलते थे पर कभी कभी टीम का बटवारा करते हुए मुसलमान बस्ती और हिन्दू बस्ती के बीच में मैच होता था लेकिन एक शकील नाम का लड़का हमेशा हिन्दू बस्ती की तरफ से ही खेलता था उसका घर हिन्दू बस्ती से लगा हुआ था, या कहूँ उसी के घर से मुसलमान बस्ती की शुरुआत होती थी, हरिजन बस्ती के लड़के दोनों टीमों में शामिल रहते हैं बस एक नाम का बटवारा था लेकिन खेल के मैदान में कोई भेदभाव नहीं होता था, खेल के मैदान में एक साथ बैठते उठते ,साथ में सब खाते-पीते थे मगर गाँव के भीतर इस बात का थोड़ा बहुत ज़िक्र होता था जब कोई लड़का अपने घर से खेलने की अनुमति माँगता तो उससे कहाँ जाता था, दूसरी जाति-धर्म के लड़के वहाँ खेलने जाते हैं तुमको वहाँ नहीं जाना चाहिये पर कोई मानता ही कहाँ था, .....यह वही खलिहान का मैदान है जिसका आकार पहले से चौथाई रह गया है किसी से ट्यूबवेल लगवा लिया है, किसी से बाउंड्री कर रखी है, किसी ने अपनी जगह पर लिप्टिस के पेड़ लगा रखें हैं , जिन-जिन लोगों का खलिहान में हिस्सा था उन्होंने कब्जा कर लिया है
बचपन में हम जिस स्कूल में पढ़ते थे वह स्कूल गाँव से लगभग डेढ़ मील दूर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित था ,गाँव से जाने वाले लगभग सभी लड़के लड़कियाँ उस स्कूल पैदल ही जाया करते थे, मुझे याद है कि मैं अपने भाई के साथ घर से निकलता था, मेरे घर के सामने वाले घर से रोशनी हमारे साथ पैदल जाया करती थी और उसके साथ उसका छोटा भाई भी जो उम्र में उससे लगभग पाँच साल छोटा था हम चार लोग घर से साथ ही निकलते थे रोशनी मेरे भाई के साथ वाली कक्षा में पढ़ती थी यानी कि एक साल आगे,.. रोशनी का पूरा नाम रोशनी पाल था वैसे तो हमारे गाँव में पाल(गड़रिया)समाज की बस्ती गाँव के बाहर किनारे किनारे दस पन्द्रह घर थे, लेकिन रोशनी का घर बीच गाँव में मेरे घर के सामने था, शायद उसका घर कई पीढ़ियों से वहीँ ही था....... गाँव से बाहर निकलते निकलते हम चार लोगों की टोली में चार-छह लड़के लड़की और शामिल हो जाते थे सब पैदल मटर-गस्ती करते हुऐ स्कूल जाते थे, ज़िक्र बचपन का हो रहा है तो कुछ यादें ..याद आ ही जाती हैं स्कूल आते-जाते हुये सड़क के किनारे मौजूद बागों से चोरी-छिपे आम-अमरूद तोड़ना हो या खेतों से कभी कभी गन्ना, तरबूज, भुट्टे, चना, मटर की फलियाँ तोड़ते थे ,
जब मेरे भाई ग्यारवीं कक्षा में गये तो मेरे घर स्कूल जाने के लिए एक साइकिल खरीदी गयी फिर मैं अपने भाई के साथ साइकिल पर स्कूल जाने लगा मेरे भाई अधिकतर मुझसे ही साइकिल चलवाते और खुद पीछे बैठकर जाते और कहते कि तुम साइकिल अच्छे से चलाने लगोगे तो अगले साल पिता जी तुमको भी साइकिल दिला देंगे, जिस दिन भाई स्कूल नहीं जाते उस दिन फिर मैं मुहल्ले के दोस्तों के साथ पैदल ही स्कूल जाता था, उन्हीं दिनों एक दिन मेरे भाई स्कूल नहीं गये थे तो साइकिल से मैं अकेला साइकिल लेकर स्कूल गया था, एक दिन तो मैंने रोशनी को पीछे केरियल पर बैठाकर थोड़ी दूर ले गया था,
रोशनी वैसे तो मुझसे एक क्लास आगे थी लेकिन मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी मेरे हर कार्य में मेरा सहयोग करती थी अक्सर हम अपने चबूतरे पर शाम को तीती,छुपा-छुपाई,कंचे इत्यादि खेल खेलते थे मुहल्ले के सभी लड़के साथ में खेलते थे,खेल में रोशनी सदैव मेरे साथ मेरे पक्ष में ही रहती थी, रोशनी के प्रति मुझे एक आत्मीय लगाव था या यूँ कहें कि वह सदैव मेरा हर प्रकार से सहयोग करती,कभी कभी तो मैं अपना होमवर्क भी उसी से करवा लेता था, मेरा होमवर्क करने से कभी उसने इनकार नहीं किया, जब कभी उसके घर में टिफ़िन के लिये कोई अच्छी चीज बनती तो रोशनी मुझे अपने टिफिन से कुछ हिस्सा मुझे रास्ते मे ही स्कूल जाते वक्त खिला देती थी
रोशनी का जिक्र मैं यहाँ सिर्फ इसलिए कर रहा हूँ कि उसके साथ जीवन में एक हादसा हुआ है मेरी बचपन की दोस्त वर्तमान में एक असाह पागल औरत है
जब मेरी नौकरी लगी थी उसी दौरान उसकी शादी हुई थी गाँव से लगभग दस किलोमीटर दूर ही उसका ससुराल था, मुझे ज्ञात है शादी के नवें साल वह अपने ससुराल से अपने मायके लौट आई थी ससुराल वालों का कहना था यह बाँझ है आठ-दस सालों में किसी बच्चे को जन्म ना दे पाने के कारण उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जाने लगा था , सास उसको मारती भी थी, बुरी-बुरी गालियाँ भी देती थी, अब उसके घर में खुले तौर पर उसके पति की दूसरी शादी की चर्चा होने लगी थी,ससुराल के कई रिश्तेदार भी दूसरी शादी के लिये मशविरे देते थे, और यहाँ रोशनी पर दिन-ब-दिन अत्याचार बढ़ रहा था, उसका पति भी उसका भावनात्मक या किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं करता था, शुरुआत में उसका पति उसे हर तरह से सहयोग करता था, जब शादी के छह-सात साल बाद उसके मन में भी वही भावना जाग गयी , इस प्रताड़ना से बचने के लिये रोशनी अपने मायके लौट आई और तब से वह यहीं हैं, उसको बाँझ होने का सदमा लग गया जो हर घड़ी उसके मन को कचोटता रहता,
मेरा मानना है कि बाँझ होने की समस्या नब्बे प्रतिशत जन्मजात नहीं होती
पहले के समय में इस समस्या के उपचार नहीं थे, मगर वर्तमान में चिकित्सीय उपचार उपलब्ध हैं, विभिन्न तरह के अवरोध हो सकते हैं मासिक धर्म का अनियमता या गर्भ का ठहराव न हो पाना, या बच्चेदानी में किसी प्रकार का संक्रमण हो सकता है, आजकल जाँच परामर्श व अच्छी चिकित्सा के माध्यम से और उचित उपचार से इस समस्या का निदान सम्भव है जब मैं नौकरी में था तो मेरे दफ्तर में एक बाबू के साथ भी यही समस्या थी,मैंने उस दौरान उनकी विभिन्न प्रकार की विभागीय सहायता की थी, उन्होंने मुझे समस्या बताई थी इसके उपचार के लिये उन्हें कई दफ़ा दिल्ली में जाना पड़ा था उन्होंने किसी अच्छे अस्पताल से टेस्ट टयूब बेबी प्रक्रिया अपनाई थी आज उनका 15 वर्ष का लड़का है, मेरी भी एक मौसेरी बहन को यही दिक्कत हुई थी उनका इलाज भी इंद्रा आई. वी.एफ. अस्पताल में हुआ था , आज उनकी दो लड़कियां हैं,........ .
रोशनी के ससुराल में गरीबी और अशिक्षा ने उसका जीवन विध्वंस कर दिया
तमाम प्रकार की समस्याएं उसके जीवन में निरंतर बनी रहीं,लेकिन उसके पिता जी जब तक जीवित रहे हैं तब तक उसका जीवन थोड़ा सरल रहा ,पिता जी के गुज़र जाने के बाद धोरे-धीरे वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई, आज अधेड़ उम्र में वह एक बूढ़ी और पागलपन का शिकार हो चुकी है,गन्दी पुरानी साड़ी में मेरे चबूतरे पर अक्सर नीम के पेड़ के नीचे ही उसका दिन बीतता था, नीम की फुनगी से बनाई हुई झाड़ू से चबुरते को बहोरा करती वही छोटे-छोटे बच्चों के साथ अभी भी वह वही खेल खेला करती जो खेल लगभग तीस वर्ष पहले कभी हमारे साथ खेला करती थी, कभी कभी तो वह अकेले ही बहुत कुछ अपने आप से बड़बड़ाया करती, मुहल्ले में किसी न किसी के यहाँ उसे रोज खाने को भोजन मिल जाता था, उसका भाई भी उसका ख़याल रखता था, उसे अपनी बहन की फिक्र थी, लेकिन पत्नी के हाँथों मजबूर था,
एक दिन सुबह खबर मिली कि उस मुहल्ले की हरिजन बस्ती के रामू चाचा का देहांत हो गया काफी दिनों से बीमार थे , जब मैंने यह खबर सुनी तो मुझसे रहा नहीं गया मैं उनके घर की तरफ चल पड़ा, उनको अंतिम विदाई देने,
मेरे मन में फिर एक ख़यालों से भरा हुआ तूफान गुज़र रहा था क्योंकि यह वही रामू था जो कभी मेरा दोस्त हुआ करता था क्रिकेट मैच का सबसे उम्दा खिलाड़ी जो खेलने में बॉलिंग में फील्डिंग में तीनों चीजों में सबसे अच्छा था, उसका फरफार्म ही हमारी टीम की हार-जीत तय करता था,आखिर वह एक गरीब हरिजन था जो उच्च शिक्षा भी नहीं पा सका ,बचपन में अपने पिता के साथ दूसरे के खेतों में बतौर मज़दूर वह भी काम किया करता था, बड़ा होकर भी वह एक किसान के रूप में ही काम करता रहा, किसी के खेत को बटाई पर लेकर, यहाँ वहाँ मज़दूरी करके उसने अपना जीवन बिताया होगा, यह होती है गरीबी वह उम्र में मुझसे एक वर्ष छोटा ही रहा होगा लेकिन मज़दूरी करते करते शरीर को समय से पहले जंग लग गई, मेरी उम्र के सभी साथी जो धन-सम्पन्न नहीं थे मुझसे काफी बूढ़े नज़र आते हैं एक दो लोग तो गरीबी में या किसी रोग के कारण स्वर्गवासी हो चुके हैं, और एक हम हैं कि जैसे अभी -अभी युवा अवस्था को छोड़कर बृद्धावस्था में कदम रख रहे हों, सच में गरीबी वो दीमक का कीड़ा है जो देह खा जाता है
हमारे गाँव में एक यादव बस्ती थी लगभग सारे यादव वर्तमान में संपन्न थे दो-चार को छोड़कर , एक अनिल यादव का परिवार था, पहले यह घर काफ़ी सम्रद्ध था लेकिन चाल-चलन से, बुरी आदतें और शराब की लत से पूरा घर कंगाल हो गया,
इसी लत में अनिल ने अपने खेत भी बेच दिये थे, घर का आधा हिस्सा भी पड़ोसी को बेचना पड़ा क्योंकि उसने बहुत उधार ले रखा था, लेकिन पिछले वर्ष प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उसे आवास मिला था और सरकारी राशन भी वह पाता था, उसके दो लड़के थे, वो दोनों भी ऊट-पटाँग के काम धंधे करते थे नशे की लत उन्हें भी थी, अय्याशी में कंगाल हुये लोगों को भी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल जाता है
एक दिन दोपहर के भोजन के बाद मैं बाहर की पुरानी कोठी में आराम कर रहा था
कि अचानक से रोते हुये चिल्लाने की आवाज आई, आवाज तो रोशनी की ही थी लेकिन विचित्र थी, मैं बाहर गया तो देखा वह एक कुत्ते को पत्थर के टुकड़े मारकर भगा रही थी, कुत्ता उस पर भौके जा रहा था, मैं दौड़ते हुये उसके पास गया तो कुत्ता मुझे देखते ही वहाँ से भाग गया, रोशनी ने मेरे पैर पकड़ लिये और बड़बड़ाते हुये बताया कि कुत्ते ने उसके हाथ में काट लिया है उसने अपना हाथ दिखाया कुहनी में वास्तव में कुत्ते के दाँत के निशान थे, थोड़ा सा खून भी बह रहा था, मैंने उसे वहाँ से उठाया और अपनी घर की देहरी पर बिठाया, घर से नाती को बुलाया और उससे हल्दी-तेल और पट्टी बाधने के लिये साफ कपड़ा मंगवाया, फिर मैंने उसके हाथ पर पट्टी बांध दी, और नाती से कहा घर से कुछ खाने को ले लाये इसको खिला दे, इतने में रोशनी का भाई आ गया उसका घर सामने ही था, वह भी दोपहर को आराम कर रहा था, उसकी पत्नी ने कुछ सुना-देखा होगा उसी ने उसे उठाया तब वह मेरे पास आया, अगली सुबह रोशनी और उसके भाई को लेकर मैं भी सरकारी अस्पताल गया और वहाँ उसे कुत्ते काटने वाला इंजेक्शन लगवाया, कुहनी पर जहाँ कपड़ा बधा हुआ था, वहाँ पट्टी बांध दी गयी, और फिर हम लोग वहाँ से लौट कर घर आ गये!
अगले दिन दोपहर के भोजन के बाद जब मैं आराम करने कोठी में गया तो
देखा रोशनी फिर नीम के पेड़ के नीचे जमीन पर लेटे लेटे कुछ बड़बड़ा रही है पहले तो मुझे लगा कि हाँथ को देख लूँ जाकर जहाँ कुत्ते ने काटा था फिर ख़याल आया कि पट्टी तो बंधी ही होगी फिर मैंने दूर से ही चिल्लाकर उसको घर जाने के लिये कहा,तो वह अचानक सिमट कर बैठ गयी फिर उठकर अपने घर की तरफ चली गयी,
मैं भी अपनी कोठी के अंदर आकर बिस्तर पर लेटे गया, थोड़ी देर बाद बिस्तर पर लेटे लेटे मेरा ख़याल रोशनी के हाँथ की तरफ गया , जहाँ कुत्ते ने काटा था उसके लगभग पाँच इंच नीचे उसके हाँथ पर गुदे हुए थे अंग्रेजी के दो अक्षर R.P. यानी कि रोशनी पाल.........
तमाम तरह के ख़याल मन में उमड़ रहे थे कि कहीं ऐसा न हो, ना ही हो तो ठीक है, अगर ऐसा हुआ तो........... घण्टों उस दोपहर मैं ख़यालों में खोया रहा नींद मेरे आँखों से कोशों दूर थी एक ही ख़याल बार बार मन में आ रहा था कि उस R. P. का मतलब रोशनी और पुनीत हुआ तो......पुनीत यानी कि मैं पुनीत पटेल!
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