कहानी (पुनीत पटेल)
वही ट्रैन वही ऐ. सी. कोच मगर आज की यात्रा में अथाह बेचैनी है मैं नौकरी से रिटायर होकर अपने पैतृक गाँव जा रहा हूँ वैसे तो मैं साल में एक-आध बार गाँव आता रहा हूँ किसी त्योहार या किसी आयोजन में छुट्टियाँ लेकर,मगर आज मैं सैदव के लिये अपने जीवन के बचे कुचे दिन अपने खेत-खलिहानों गाँव में बिताने अपने गाँव लौट रहा हूँ ख़यालों की एक आँधी मन से गुज़र रही है नये-पुराने विचार मन में उमड़ रहे हैं नौकरी में बिताये लगभग 30 वर्ष के सारे ख़याल एक चक्रवात की तरह मन में उमड़ रहे हैं आज मेरा गाँव मुझे इस तरह आकर्षित कर रहा है कि जैसे युवा अवस्था में ग्रेजुएशन के दौरान दिमाक में नौकरी पाने के लिये लालायित रहते थे रात के लगभग 11 बज चुके थे सामने वाली बर्थ के सभी लोग सो रहे थे, मैं अपने मन के उमड़ते ख्यालों को विराम देना चाहता था मैंने बोतल निकाल कर पानी पिया और सोचा बाथरूम करके अब सो जाऊँगा मैं बाथरूम होकर लौट आया पूरे कोच में ख़ामोशी थी सब लोग ही सो रहे थे आवाज सिर्फ ट्रेन के चलने की रफ़्तार की आ रही थी मैं अपनी बर्थ पर लेट गया और आँख बंद करके सोने की कोशिश करने...